Thursday, 23 January 2014

परीलोक से भूलोक तक

परीलोक से भूलोक तक

एक बार फिर मैं अपनी नई कहानी लेकर आपसे रूबरू हो रहा हूँ, यह कहानी असल में मेरा एक सपना है, जो मैंने अभी तीन–चार दिन पहले ही देखा था, उसी को आपके सामने एक कहानी के रूप में पेश कर रहा हूँ, आशा करता हूँ मेरा यह सपना आप सभी को पसंद आएगा। मेरी दूसरी कहानी ‘साजन का अधूरा प्यार’ को आप सभी का बहुत प्यार मिला, आगे भी मैं उम्मीद करता हूँ, आपका प्यार इसी तरह बरक़रार रहेगा।

मैं एक अच्छी कम्पनी में जॉब करता हूँ, कुल मिलाकर गुजारा ठीक-ठाक हो रहा था, एक दिन मैं अपने ऑफिस से जल्दी आ गया क्योंकि उस दिन घर पर कोई नहीं था, सभी लोग गाँव गए हुए थे शादी में, अभी शादी में दो दिन बाकी थे इसलिए मैं अभी नहीं गया था क्योंकि मुझे ऑफिस से छुट्टीई नहीं मिल पाई थी। ऑफिस से जल्दी आकर मैंने पहले तो अपने कपड़े सर्फ़ में भिगो दिए ताकि मुझे कपड़े धोने में ज्यादा मेहनत न करनी पड़े, उसके बाद मैं बाजार से सब्जी लेने चला गया, घर पर मैं बिल्कुल अकेला था तो सारे काम मुझे खुद ही करने थे।

मैं सब्जी लेकर अपने घर पहुँचा, फिर मैं कपड़े धोने लगा। करीब आधे घंटे में मैंने अपने सारे कपड़े धो डाले, कपड़े धोने की मुझे आदत तो थी नहीं, इसलिए मुझे कुछ थकावट सी हो गई तो मैं थोड़ी देर के लिए अपने बेड पर लेट गया, कब मुझे नींद ने धर दबोचा इसका पता भी नहीं चला और मैं सो गया।

दूर कहीं आकाश में परियों का देश था, एक दिन एक परी अपने परीलोक से घूमने के लिए निकली, उस परी का नाम सोनपरी था, वो सभी परियों में सबसे सुन्दर थी, जब उसको ज्यादा वक़्त हो गया तो वो वापस परीलोक जाने लगी कि अचानक उस परी के हाथ से उसकी जादुई छड़ी छुट कर ना जाने कहाँ खो गई, उसने अपनी छड़ी बहुत खोजा पर उसको नहीं मिली, वो बहुत उदास हो गई क्योंकि उस जादुई छड़ी के बिना वो अपने परीलोक में प्रवेश नहीं कर सकती थी।

थक-हार कर उसने रानी परी को याद किया, कुछ ही देर में रानी परी उसके सामने खड़ी थी, उसने रानी परी को सारी बात सच सच बता दी और रानी परी से पूछने लगी- अब मैं क्या करूँ? आप तो रानी परी हैं आप मुझे दूसरी छड़ी दे दो जिससे मैं परीलोक में प्रवेश कर सकूँ।

रानी परी ने कहा- परीलोक के नियम के अनुसार सभी परियों को एक ही बार जादुई छड़ी मिलती है और यह नियम मैं भी नहीं तोड़ सकती।

सोनपरी ने रानी परी से काफी विनती की पर रानी परी टस से मस नहीं हुई, सोनपरी रोने लगी तो रानी परी को उस पर दया आ गई और सोनपरी से बोली- तुम रोओ नहीं, मैं तुम्हारी इतनी मदद कर सकती हूँ कि तुमको यह बता सकती हूँ कि तुम्हारी छड़ी कहाँ गिरी है, और तुमको कैसे मिलेगी।

सोनपरी ने रानी परी से कहा- रानी परी, बतायें मुझे मेरी छड़ी कैसे मिलेगी?

रानी परी बोली- तुम्हारी छड़ी दूर पृथ्वी लोक पर गिरी है और वो एक वाटिका में है, पर परीलोक के नियम अनुसार अब तुम उसको देख नहीं सकती, पर एक युवक है जो उसको देख सकता है और वही युवक तुम्हारी मदद भी करेगा, पर वो भी उस छड़ी को रात्रि के दूसरे पहर के बाद ही देख सकता है, उस युवक का नाम साजन है।

और फिर रानी परी उसको साजन के पास जाने का मार्ग बताने लगी, रानी परी की बात सुनकर सोनपरी बहुत खुश हुई, फिर सोनपरी रानी परी से आज्ञा लेकर पृथ्वी लोक की तरफ चल दी।

कुछ देर बाद ही मुझे ही दरवाजे पर मुझे दस्तक सुनाई दी, अब कौन आ गया? कुछ देर आराम भी नहीं करने देते, मैं भुनभुनाते हुए बेड से उठा और फिर दरवाजा खोलने लगा, जैसे ही मैंने दरवाजा खोला तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई, मेरे सामने एक लड़की खड़ी थी, वो बला की खूबसूरत थी, मेरे आँखें जैसे पलक झपकाना भूल ही गई हों, मैं एकटक उन लड़की को देखे ही जा रहा था और वो मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी।

तभी उस लड़की ने मुझसे कहा- मुझे साजन जी से मिलना है, क्या साजन जी घर पर हैं?

'कितनी मधुर आवाज है इसकी ! जैसे किसी ने मेरे कानों में शहद गोल दिया हो।' मेरे मुख से जैसे आवाज निकलनी ही बंद हो गई थी, मैंने हकलाते हुए कहा- ज... ज... जी... म... मैं... हह... ही... सा... ज... न हूँ... क... कही... ही... य... ये... क... या क्या क का... म है?

मैंने अपने आप को संभाला और सोचने लगा लो क्या यह सच में मुझसे ही मिलने आई है? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं हो रहा था। वो लड़की मेरी विचारधारा को भंग करते हुए बोली- जी मेरा नाम सोनपरी है, और मुझे आपकी मदद चाहिए।

मैं तब तक अपने आप को संभाल चुका था, तो मैंने कहा ठीक है आप अन्दर आइये, अन्दर बैठ कर बात करते है और मैं दरवाजे से साइड हो गया और वो लड़की जिसने अपना नाम सोनपरी बताया था, घर के अन्दर आ गई तो मैंने घर का दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया।

मैंने सोनपरी को सोफे पर बिठाया और उससे पानी के लिए पूछा, तो उसने मना कर दिया, फिर मैं भी उसके सामने सोफे पर बैठते हुए बोला- अब आप बतायें कि मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?

सोनपरी बोली- मैं एक परी हूँ और मैं परीलोक से आई हूँ, मैं परीलोक से घूमने के लिए निकली थी, घूमते-घूमते मेरे हाथ से मेरी जादू की छड़ी गिर गई, मैंने उसको बहुत तलाश किया पर मुझे वह नहीं मिली।

उसकी बात सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह क्या कह रही है, ये तो सब बकवास है, न तो कोई परी है और न ही उसका कोई उनका लोक, मुझे उसकी बातों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, पर इसको देखकर तो यही लगता है कि वास्तव में ही कोई परी ही है, मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था।

मैं सोफे से उठा और एक गिलास पानी पिया और फिर मैंने अपने सर को बहुत जोर से झटका और फिर वापस बैठ गया।

मैंने सोनपरी को कहा- मुझे पता नहीं कि आप सच बोल रही हैं या फिर झूठ, चलो मान लेता हूँ, आप सच ही कह रही हो तो जहाँ तक मैंने पढ़ा और सुना है, आपके पास ऐसी जादू की छड़ी की कोई कमी नहीं होगी तो आप उस छड़ी की क्या आवश्यकता है, और इसमें मैं आपकी मदद कैसे कर सकता हूँ?

सोनपरी बोली – साजन जी, असल में बात यह है कि मैं उस छड़ी के बिना परीलोक में प्रवेश नहीं कर सकती।

सोनपरी की आवाज इतनी मधुर और मीठी थी, जब भी बोलती है तो लगता है कि जैसे कोयल कोई गीत सुना रही हो। मैंने अपने सर को फिर से झटका और अपने ख्यालों की दुनिया से वापस आया, मैंने कहा- ठीक है, पर मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ, यह तो आपने बताया ही नहीं।

सोनपरी बोली- साजन जी, जब हमारी छड़ी नहीं मिली तो मैं बहुत उदास हो गई थी उसी वक़्त मैंने रानी परी को याद किया तो वो सामने आ गई, मैंने उनको अपनी समस्या बताई, काफी मिन्नतें करने के बाद रानी परी ने मुझे बताया कि मेरी छड़ी कहाँ गिरी है और उन्होंने यह भी बताया कि जिधर हमारी छड़ी गिरी है, वहाँ साजन नाम का एक लड़का रहता है और वो ही तुम्हारी छड़ी तलाशने में तुम्हारी मदद करेगा क्योंकि अब वो छड़ी सिर्फ साजन को ही दिखाई देगी, साजन जी क्या आप हमारी मदद करेगे?

यह सवाल सोनपरी ने किया और फिर वो बोली- बदले में आप जो चाहोगे मैं करने के लिए तैयार हूँ, पर आप हमारी मदद करें, मैं बड़ी उम्मीद से आपके पास आई हूँ।

अब मैं क्या बोलूँ, मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था, यह सच कह रही है या झूठ, मैं तो यह भी फैसला नहीं कर पाया।

सोनपरी अपने दोनों हाथ जोड़ कर मुझसे बोली- साजन जी, हमारी मदद कीजिये, नहीं तो मैं अपने लोक कभी वापस नहीं जा सकूँगी। मैंने सोनपरी को बोला- प्लीज़ आप मुझे इस तरह शर्मिंदा न करें, मेरे से जो बन सकेगा, मैं आपकी मदद करूँगा।

पता नहीं क्यों मैं उसको मना नहीं कर पाया, मैंने सोनपरी को बोला- चलिए आपकी छड़ी को खोजते हैं।

सोनपरी बोली- साजन जी, वो छड़ी आपको रात के दूसरे पहर, यहाँ के हिसाब से रात के 12 बजे के बाद ही दिखाई देगी, अभी हम चाहकर भी उसको नहीं देख सकते।

मैंने घड़ी की तरफ देखा तो अभी रात के आठ बजे रहे थे, मैंने कहा- ठीक है, हम रात को 12 बजे के बाद ही उसको खोजेंगे, आप तब तक आराम कर लो। मैं खाना बना लेता हूँ, आपको भी भूख लगी होगी !

इतना कह कर मैं रसोईघर में चला गया। खाना बनाते हुए मैं सोच रहा था, सोनपरी वास्तव में ही परी तो नहीं है, जो यह कह रही है वो मुझे सच भी लग रहा था क्योंकि उसकी वेशभूषा तो इसी प्रकार ही थी। फिर मैं सोनपरी के रूप में खोता ही चला गया, संगमरमर जैसा उसका गोरा बदन, वो इतनी गोरी थी कि कोई भी उसको हाथ लगाने से पहले दस बार सोचेगा कहीं मेरे हाथ लगाने से यह मैली न हो जाये ! सोनपरी की बड़ी-बड़ी आँखें जैसे कोई झील हो, माथे पर कुमकुम की छोटी सी बिंदी उसकी सुन्दरता को चार चाँद लगा रहे थे, पतले गुलाबी होंठ जैसे गुलाब की पंखुड़ी, सुराहीदार उसकी गर्दन, उसके शरीर पर मात्र दो ही वस्त्र थे, एक वस्त्र ने उसके दोनों उभारों को कैद किया हुआ था और दूसरा वस्त्र जो कि वो साड़ी जैसा दिखता था पर साड़ी के जैसा बिल्कुल नहीं था, उसकी कमर से ऊपर का हर एक अंग दिखाई दे रहा था बस उसके उभारों को छोड़कर, वो तो बस सर से पाँव तक काम की देवी ही लग रही थी।

तभी अचानक मेरी सोच को विराम लगा, मेरे मोबाइल फ़ोन की घंटी बज रही थी, फ़ोन को उठा कर देखा तो मेरे मम्मी का फ़ोन था।

'हैल्लो !' मम्मी जी मैंने फ़ोन रिसीव करते हुए कहा तो मम्मी की आवाज आई- बेटा, टाइम से खाना खा लेना, हमें तेरी बहुत चिंता हो रही है, अगर तुम भी साथ आ जाते मुझे चिंता नहीं रहती, पर अब तुझे खुद ही अपना ध्यान रखना पड़ेगा।

"मैं ठीक हूँ मम्मी जी, आप मेरी चंता न करो और दो ही दिन की तो बात है, मैं रह लूँगा।

मम्मी बोली- ठीक है बेटा, पर तुम शादी में टाइम से पहले पहुँच जाना।

मैंने कहा- ठीक है मम्मी जी !

इतना सुनने के बाद मम्मी ने फ़ोन काट दिया। मेरा खाना भी बन चुका था, मैं रसोई से बाहर आया तो देखा वो अब भी सोफे पर बैठी थी, मैं सोनपरी से बोला- यह क्या सोनपरी जी, आप तो अभी तक यहीं बैठी हैं, आप फ्रेश भी नहीं हुई, चलिए आप फ्रेश हो जाओ, खाना बन चुका है, जब तक आप फ़्रेश होंगी तब तक मैं खाना लगाता हूँ।

और फिर मैं सोनपरी को बाथरूम भेज कर में खाना लगाने लगा।

हम दोनों ने खाना खाया और फिर से हम एक दूसरे के सामने बैठ गए, सोनपरी ने मेरे बनाये हुए खाने की बहुत तारीफ की और बात करते करे समय का पता ही नहीं चला कि कब 11:45 हो गये मैंने सोनपरी से कहा- अब 12 बजने वाले हैं, हमें अब चल कर छड़ी को खोजना है।

पर तभी मेरे दिमाग में आया कि हम उसको खोजेंगे कैसे, हमें क्या पता कि छड़ी कहाँ गिरी है और यही बात मैंने सोन परी से कही। सोनपरी बोली– साजन जी मुझे रानी परी ने इतना बताया था कि वो आपके पास की वाटिका में ही कहीं गिरी है, अब बताओ कि आपके घर के पास कौन सी वाटिका है, हमें वहीं चल कर उसको खोजना होगा।

मैंने सोनपरी से कहा- वो तो हमारे घर के पास ही है, चलो अब तो पूरे 12 भी बज चुके हैं।

फिर हम दोनों पार्क में गए और उस छड़ी को खोजने लगे। थोड़ी सी मेहनत के बाद वो छड़ी मुझे मिल ही गई, मैंने उसको सोनपरी को थमा दिया, उसको छड़ी देने के बाद हम दोनों घर वापस आ गए।

सोनपरी मुझे से बोली- आपने इस छड़ी को खोजने में मेरी बहुत सहायता की है, अब आप बतायें कि मुझे क्या करना है, जैसा कि मैंने आप से कहा था, आप जो कहेगे मैं वो करुँगी, बतायें साजन जी मुझे क्या करना है?

तो मैंने कहा- उसकी कोई आवश्यकता नहीं है, आपने इतना कह दिया बस यही बहुत है मेरे लिए, आप जैसी अप्सरा परी से मिला और आपके साथ इतना वक़्त गुजारा, यही क्या मेरे लिए किसी इनाम से कम है।

सोनपरी बोली- ठीक है साजन जी, पर मुझे आपको कुछ देने की इच्छा हो रही है।

मैंने सोनपरी से पूछा- क्या देने की इच्छा है?

तो वो बोली- ऐसा कुछ जो आप जीवन भर न भूल पाओ !

मैंने फिर पूछा- बताओ न सोनपरी जी?

सोनपरी बोली- पहले आप अपनी आँखें बंद करो !

तो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली, सोनपरी मेरे इतने समीप आ गई, उसकी साँसों को मैं अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था, उसने अपने गुलाबी रस भरे होंठ मेरे होंठ पर रख दिए और मुझे चुम्बन करने लगी, मुझे उसका यह चुम्बन बहुत ही अच्छा लगा इसलिए मैं उसको मना नहीं कर सका, सोनपरी ने करीब दस मिनट तक मुझे चुम्बन किया।

इस तरह उसका चूमना मुझे आनन्दित कर रहा था, मेरी तो समझ में नहीं आ रहा था, कि मैं क्या करूँ, बस उसके सामने चुपचाप खड़ा रहा।

सोनपरी ने मुझसे पूछा- आपको कैसा लगा मेरा चुम्बन?

तो मैंने कहा- बहुत अच्छा !

तो फिर से उसने मुझे चूमना शुरू कर दिया, मेरे होंठ वो बहुत ही प्यार से चूस रही थी और मुझे चूमते हुए उसने अपना एक हाथ मेरे पैंट के ऊपर उभरे हुए लिंग पर रख दिया, मेरा लिंग इस वक़्त सख्त हो चुका था और वो मेरे लिंग को हाथ में पकड़ कर दबा रही थी, बहुत ही सुखद एहसास हो रहा था मुझे, काश वक्त यही थम जाये, पर वो था कि निरंतर चलता जा रहा था।

अब उसने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए और एक एक करके सारे बटन खोल डाले फिर उसने मेरी बनियान भी उतार दी, मैं ऊपर से पूरा निर्वस्त्र हो चुका था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

अब उसके हाथ मेरी पैंट को खोलने में व्यस्त हो गए, फिर उसने मेरी पैंट भी उतार दी, अब सिर्फ मैं अंडरवियर में था, सोनपरी की इन हरकतों से मेरा लिंग उत्तेजित हो चुका था, वो अंडरवियर से बाहर आने के लिए मचल रहा था, सोनपरी ने मेरा एक मात्र अंडरवियर भी उतार दिया, मैं अब उसके सामने पूरा जन्मजात नंगा हो चुका था और वो अभी वैसे ही थी, उसने अपने कपड़े अभी तक नहीं उतारे थे।मेरे लिंग को हाथ में पकड़कर उसको सहलाने लगी, उसके नाजुक हाथ में लिंग को सहला रहे थे और वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा रही थी।

अब तक मेरे तनबदन में आग लग चुकी थी, मैंने सोनपरी को पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और उसके लबों पर मैं अपने लब रख कर उसके लब चूसने लगा, वो मेरा लिंग अपने हाथ से सहला रही थी। जैसे ही मैंने उसके ऊपर के वस्त्र को खोला तो उसके स्तन मेरे हाथों में आ गए, सोनपरी ने अन्दर कुछ भी नहीं पहना हुआ था, मैं उसके स्तन को बड़े ही प्यार से दबाने और सहलाने लगा।

उसके स्तन बहुत कड़े थे, मुझे इतना आनन्द आ रहा था कि मैं बयान नहीं कर सकता। सोनपरी मेरे लिंग को सहलाते सहलाते नीचे की तरफ बैठने लगी, फिर उसने मेरे लिंग पर एक चुम्बन अंकित किया और मेरे लिंग का सुपारा अपने मुंह में लेकर चूसने लगी, उसकी लिंग चुसाई से आनंदित होकर मैं उसके बालों में हाथ फेरने लगा।

मैं सोनपरी को लेकर बिस्तर पर पहुँचा, फिर मैंने उसका आखिरी वस्त्र भी उतार दिया, अब हम दोनों नग्न अवस्था में एक दूसरे को चूम रहे थे, मैं उसके स्तन को अपने मुंह में लेकर चूसने लगा और साथ ही अपना एक हाथ उसकी योनि पर रख दिया। उसकी योनि मेरे हाथ में ऐसी लग रही थी जैसे मखमल के ऊपर हाथ रखा हो, बहुत ही नाजुक और साफ सुथरी थी उसकी योनि !

मैंने उसकी योनि में अपनी एक उंगली डाल दी, अन्दर से बहुत ही गर्म थी वो, जैसे ही मैंने उसमे अपनी उंगली डाली, वो ऊपर की तरफ उछल गई और उसके मुँह से मादक स्वर निकल पड़े- ऊऊऊआआअ स्सस्सीईईईई !

उसके ये स्वर मुझे और भी उत्तेजित कर रहे थे, मैंने उसके स्तन चूस चूस कर लाल कर दिए, जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैं उसकी टांगों के बीच आ गया और अपने लिंग को उसकी योनि के ऊपर रगड़ने लगा।

सोनपरी उतेजना के मारे अपने स्तन अपने ही हाथों से मसलने लगी, मैंने उसकी उतेजना को देखते हुए अपना लिंग उसकी योनि में डाल दिया जैसे ही मेरा लिंग योनि के अन्दर गया उसके मुंह से मादक स्वर फ़ूट पड़े- ऊऊऊउईईईईई स्स्स्सीईई !

सोनपरी की योनि इतनी तंग थी कि बहुत ही मुश्किल से मेरा लिंग योनि के अन्दर जा रहा था, मेरे लिंग में मीठा मीठा दर्द हो रहा था, जब मैंने अपना पूरा लिंग उसकी योनि में डाल दिया, वो दर्द के कारण जोर से चीख पड़ी- ऊऊईईईईम्म्म्माआआअ !

उसकी योनि से मुझे कुछ गर्म गर्म तरल सा निकलता हुआ प्रतीत हुआ, शायद वो खून था जो मेरे लिंग को भिगोता हुआ योनि से बाहर निकल रहा था।

मैं उसके ऊपर पूरा लेट गया और उसके लबों को अपने होंठों के बीच दबाकर चूसने लगा।

जब उसका दर्द कुछ कम हुआ तो वो अपनी योनि को मेरे लिंग पर दबाने लगी, फिर मैंने भी उसकी पैरों को उसकी छाती से मिला कर अपने लिंग से उसकी योनि पर घर्षण करने लगा, सोनपरी के मादक स्वर से पूरे कमरे में गूंज रहे थे- ऊऊफ़्फ़फ़ आऐईईइफ़ ऊऊऊऊ ऊऊउईईई ऊऊऊओ !

अब उसको भी मज़ा आ रहा था, तो उसने अपने पैरों को सीधा किया और वो नीचे से अपने चूतड़ उछालने लगी, मैं उसके स्तनों को दबा कर चुदाई कर कर रहा था कि अचानक उसने मुझे कस कर जकड़ लिया और उसकी योनि से प्रेम रस की वर्षा मेरे लिंग पर होने लगी।

म्मम्म ऊऊह्ह !

इसके बाद वो स्थिर हो गई थी, पर मेरा अभी नहीं हुआ था तो मैं उसके स्तन को जो जोर से मसलते हुए उसकी योनि पर धक्के मारने लगा, कुछ देर बाद ही मेरे लिंग से भी पिचकारी छुट गई, और उसकी योनि को अपने प्रेम रस से भर दिया।

कुछ देर हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे, मेरा लिंग भी सिकुड़ कर उसकी योनि से बाहर आ गया था।

मैं जब उसके ऊपर से उठा तो देखा सोनपरी की योनि से रक्त और वीर्य मिल कर बाहर निकल रहा था। मैंने तौलिये से सोनपरी की योनि को साफ़ किया और फिर अपने लिंग को भी साफ़ किया।

सोनपरी उठी और बाथरूम जाने लगी पर उससे तो चला भी नहीं जा रहा था, मैं उसको सहारा देकर बाथरूम के अन्दर ले गया तो उसने कहा- आप बाहर जाओ, मैं अभी आती हूँ !

मैं बाहर आ गया, कुछ देर बाद वो भी बाहर आ गई, और मैं उसको फिर से अपनी बाहों में लेकर बेड पर लेकर लेट गया। वो मेरे कंधे पर सर रख कर लेटी रही और मैं उसके स्तन से खेलता खेलता कब नींद के आगोश में चला गया, कुछ पता ही नहीं चला।

सुबह 6 बजे मेरे फ़ोन का अलार्म बजा तो मेरी नींद खुली और जैसे ही मैं उठा तो देखा मेरे शरीर पर एक कपड़ा भी नहीं था, मुझे रात की बात याद आई तो मैं सोनपरी को देखने लगा पर वो मुझे पूरे घर में कहीं नहीं मिली, दरवाजा अब भी अन्दर से ही बंद था, फिर मैं सोचने लगा- क्या जो कुछ हुआ, वो हकीकत था या फिर कोई सुनहरा सपना?

मेरी कुछ समझ में नहीं आया तो मुझे वो एक हसीं सपना ही लगा पर जो भी था बड़ा ही प्यारा था।

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