Thursday, 23 January 2014

डर और दर्द में भी मज़ा है

डर और दर्द में भी मज़ा है

जब मैं एक एक करके अपने कपड़े उतार रही थी तब अजीब सी बेचैनी हो रही थी ! पूरे कपड़े उतरे तो शीशे के सामने मैंने खुद को देखा ! हे भगवान ! पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई.. बता नहीं सकती कि क्या चल रहा था मेरे मन में ! डर और रोमांच का मिलाजुला सा अनुभव हो रहा था। क्या किया था मैंने या क्या करने जा रही मैं तो मेरी ऐसी हालत हो रही थी।

असल में इस दीपावली के बाद मेरे पति तो अपने व्यापार के सिलसिले में टूअर पर चले गये और मैं मिलन के विरह में तड़प रही थी। वो दिवाली से एक दिन पहले ही टूअर से आए थे मेरे लिए बहुत सारे उपहार लेकर, दो महंगी साड़ियाँ एक भारी हीरे जड़ा नेकलेस ! लेकिन मुझे जो चाहिये था उनसे, उसके लिये उनके पास वक्त नहीं था ! मैंने पहल करने की कोशिश भी की लेकिन वो तो दीपावली पूजने के बाद बेडरूम में अपना लैप्टॉप खोल कर बैठ गए और मैं जैसे 'जल बिन मछली...'

मेरे पति का ज्यादा समय अपने बिजनेस टूअर में ही निकलता है, मेरा एक बेटा है जो बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता है। मैं अकेली अपना समय कैसे बिताती हूँ, मेरे सिवा कौन जान सकता है ! ऐसे में अपना अकेलापन काटने के लिए मैंने अपने पति की अनुमति से एक नवयौवना छात्रा को अपने घर में पेईंग गैस्ट रख लिया। अरे यह मैं भी क्या बातें करने लगी ! ये बातें फ़िर कभी !

तो मैं अपने पूरे वस्त्र हटा कर दर्पण के सामने खड़ी सोच रही थी कि जो मैं करने जा रही हूँ वो मैं कर पाऊँगी? और यदि कर भी लिया तो यह क्या ठीक होगा?

मैं अपना समय बिताने के लिए इन्टर्नेट का प्रयोग करती हूँ, मेरी पेईंग गैस्ट लड़की श्रेया ने मेरा एक मित्र भी बनवा दिया था जिससे मैं अपना सुख दुख चैट पर सांझा कर लिया करती थी। मेरे पति के आने से पहले श्रेया भी अपने घर चली गई थी तो अकेलापन काटने के लिए मैं अपने मित्र से कुछ कामुक सलाह मांग रही थी तो उन्होंने मुझसे यह करने को कहा:

रात को दस बजे या उसके बाद जब तुम्हें लगे कि तुम्हें कोई नहीं देखेगा, तुम अपने सारे कपड़े उतार कर पूरी नंगी होकर एक जलती मोमबत्ती लेकर अपनी घर की छत का एक चक्कर लगा कर आओ। इसमें तुम्हें कैसा मजा आता है मुझे बताना !

तो यही साहसिक सेक्सी काम करने के लिए ही मैंने अपने कपड़े उतारे थे।

अब आगे:

मैंने रूम के एसी का तापमान थोड़ा बढ़ा दिया, एक मोटी लम्बी मोमबत्ती जलाई और माचिस अपने हाथ में लेकर अब मैं सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगी।

मेरे बदन पर कपड़ों के नाम पर एक धागा भी नहीं, मुझे हल्की ठण्ड भी लग रही थी और यह भी जानती थी कि ऊपर छत पर कितनी ठण्ड होगी। बाल खुले, हाथ में मोमबत्ती और सांसें तेज ! दिल में कुछ अलग ही कुछ होने लगा, मैं बता नहीं सकती ! धड़कनें तेज़ ... उत्तेजना, भय और रोमांच के कारण मेरे विशाल स्तन थोड़े सुकड़ कर सीधे खड़े हो गए थे, मेरी उठती गिरती सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे...

मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगी... पहले माले पर पहुँची... मेरी तेज़ सांसों से मोमबत्ती बुझ गई तो मैंने फिर से जला दी...

आगे बढ़ी दूसरी मंजिल पर पहुँची, जैसे जैसे मैं छत के निकट पहुँच रही थी, मेरे बदन में झुरझुरी हो रही थी, सांसें और तेज़ हो रही थी...

जब छत के दरवाजे पर पहुँची तो अचानक एक भय मेरे मन में समा गया... हिम्मत नहीं कर पा रही थी कि सारी दुनिया के सामने ऐसे... कैसे? चाहे मैं जानती थी कि इस वक्त मुझे देखने वाला कोई नहीं होगा पर फ़िर भी डर तो था ही ना कि अगर किसी ने देख लिया तो !

फ़िर सोचा यही डर तो इस खेल में रोमांच और आनन्द भरेगा, मैंने मन में ठान लिया... आज डर और मज़ा एक साथ... मेरे उरोज जो अपने ही वजन के कारण कुछ कुछ लटकने लगे थे, इस समय किसी पहाड़ की दो चोटियों के साथ पूरे तने खड़े थे, सारे शरीर पर रोंगटे खड़े हो गये थे !

हमारा घर बहुत बड़ा है तो छत भी काफ़ी बड़ी है शायद 4500-5000 फीट ! आसान नहीं था इस ठण्ड में नंगी होकर मोमबत्ती हाथ में लेकर पूरी छत का कम से कम एक चक्कर लगाना... पर मैंने अपने उसी मित्र को कही हुई बात याद की कि 'मैं कर लूँगी !' और एक तरफ़ से मैंने धीरे धीरे चलना शुरु किया। हवा तेज़ थी, मेरे घुंघराले बाल उड़ रहे थे... मोमबत्ती कहीं बुझ ना जाए इसलिए मेरी निगाहें उसी पर थी, एक हाथ से ढक कर उसे हवा से बचाने का प्रयास करती मैं चली जा रही थी धीरे धीरे.. बड़ा मज़ा आ रहा था.. मन में वो भय बरकरार था ही कि अगर किसी ने देखा तो क्या...

मैं तो इधर उधर देख भी नहीं पा रही थी कि कोई देख रहा है या नहीं मेरा सारा ध्यान तो मोमबत्ती पर ही था। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

आधा चक्कर हुआ होगा कि अचानक हवा का एक तेज झोंका आया और मोमबत्ती बुझ गई और डर के मारे मैंने मोमबत्ती को अपने सीने से लगा लिया, जल्दी जल्दी में उसका पिंघला मोम मेरे दायें स्तन पर गिर गया.. मेरे मुख से चीख निकलने वाली ही थी.. पर मैंने खुद को संभाल लिया... तभी झट से नीचे लेट कर फिर मोमबत्ती जला कर दो मिनट उसकी लपट बढ़ने तक इन्तजार किया.. इधर उधर देखा... मोमबत्ती की लौ को हाथ से ढका और चल पड़ी बाकी बचा आधा चक्कर पूरा करने..

मेरी चूची पर काफ़ी जलन हो रही थी... फिर भी चक्कर पूरा किया। उसके बाद दौड़ते हुए नीचे रसोई में पहुँची...अभी भी मेरे वक्ष के उभार वैसे ही पर्वतशिखरों की भान्ति सिर उठाये खड़े थे.. रोंगटे तो भय, अचरज और सफ़लता के गर्व के कारण और उभर आए थे।

मैंने अपने स्तन पर से मोम उतारा, झट से फ़्रिज़ से बर्फ़ निकाल कर अपनी चूची पर लगाई... थोड़ा अच्छा लगा... जला तो नहीं था पर त्वचा थोड़ी लाल हो गई थी, अब भी थोड़ी जलन थोड़ा दर्द महसूस हो रहा था !

पर मैंने एक बात जान ली कि दर्द में बहुत मज़ा है ! आज पहली बार यह दर्द भी मुझे अच्छा लगा ! मज़ा आया...

यह सब आपबीती भी मैं पूर्ण नग्नावस्था में ही टाइप कर रही हूँ... इस घटना को घटे अभी पाँच मिनट भी नहीं बीते हैं।

मैं बता नहीं सकती.. कितना मज़ा आया इसमें.. आपको विश्वास नहीं होगा.. जब मैं नीचे आई तो मेरी योनि पूरी गीली हो गई थी... इसने पानी छोड़ दिया था...

मैंने खुद भी नहीं सोचा था कि मैं अपने बदन को बिना किसी पुरुष या स्त्री के या खुद के स्पर्श के परम यौनानन्द प्राप्त कर सकती हूँ। मैं अपने उस दोस्त को यही कहूँगी कि मैं बहुत खुश हूँ ! यह एक अलग अदभुत अनुभव रहा !

पर मन के अन्दर एक डर व्याप्त है: 'मुझे उस हालत में किसी ने देखा तो नहीं होगा ना.. अगर हाँ तो...? पर इतने ऊपर कैसे कोई देखेगा इतनी रात में... नहीं ! मेरा डर बेबुनियाद है !

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