Friday, 17 May 2013

पराया मर्द बेचैन निगाहें - Paraya Mard

पराया मर्द बेचैन निगाहें - Paraya Mard

मेरी शादी हुये दो साल हो चुके थे। मेरे पति बी एच ई एल में कार्य करते थे। उन्हे कभी कभी उनके मुख्य कार्यालय में कार्य हेतु शहर भी बुला लिया जाता था। उन दिनो मुझे बहुत अकेलापन लगता था। मेरी पढ़ाई बीच में ही रुक गई थी। मेरी पढ़ाई की इच्छा के कारण मेरे पति ने मुझे कॉलेज में प्रवेश दिला दिया था। मैं कॉलेज में एडमिशन ले कर बहुत खुश थी। कॉलेज जाने से मेरी पढ़ाई भी हो जाती थी और समय भी अच्छा निकल जाता था।

कई बार मेरे मन में भी आता था कि अन्य लड़कियों की तरह मैं भी लड़कों के साथ मस्ती करूँ, पर मैं सोचती थी कि यह काम इतना आसान नहीं है। यह काम बहुत सावधानी से करना पड़ता है, जरा सी चूक होने पर बदनामी हो जाती है। फिर क्या लड़के यूं ही चक्कर में आ जाते है, छुप छुप के मिलना, और कहीं एकान्त मिल गया तो पता नहीं लडके क्या न कर गुजरें। उन्हें क्या ... हम तो चुद ही जायेंगी ना। आह ! फिर भी जाने क्यूं कुछ ऐसा वैसा करने को मन मचल ही उठता है। लगता है जवानी में वो सब कुछ कर गुजरें जिसकी मन में तमन्ना हो। पराये मर्द से शरीर के गुप्त अंगों का मर्दन करवाना, पराये मर्द का लण्ड मसलना, मौका पा कर गाण्ड मरवाना, प्यासी चूत का अलग अलग लण्डों से चुदवाना ...।

धत्त ! ये क्या सोचने लगी मैं ? भला ऐसा कहीं होता है ? मैंने अपना सर झटका और पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करने लगी। पर एक बार चूत को लण्ड का चस्का लग जाये तो चूत बिना लण्ड लिये नहीं मानती है, वो भी पराये मर्दों के लिये तरसने लगती है, जैसे मैं ... अब आपको कैसे समझाऊं, दिल है कि मानता ही नहीं है।

मेरी क्लास में एक सुन्दर सा लड़का था, उसका नाम संजय था, जो हमेशा पढ़ाई में अव्वल आता था। मैंने मदद के लिये उससे दोस्ती कर ली थी। उससे मैं नोट्स भी लिया करती थी।

एक बार मैं संजय से नोट्स लेकर आई और मेज़ पर रख दिए। भोजन वगैरह तैयार करके मैं पढ़ने बैठी। कॉपी के कुछ ही पन्ने उलटने के बाद मुझे उसमें एक पत्र मिला। संजय ने वो पत्र मुझे लिखा था। उसमें उसने अपने प्यार का इज़हार किया था। बहुत सी दिलकश बातें भी लिखी थी। मेरी सुन्दरता और मेरी सेक्सी अदाओं के बारे में खुल कर लिखा था। उसे पढ़ते समय मैं तो उसके ख्यालों में डूब गई। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई मुझसे प्यार करने लगेगा। फिर मुझे लगा कि मैं ये क्या सोचने लगी... मैं तो शादी शुदा हूँ, पराये मर्द के बारे में भला कैसे सोच सकती हूँ।

तभी अचानक घर की घण्टी बजी। बाहर देखा तो संजय था ... मेरा दिल धक से रह गया। यह क्या ... यह तो घर तक आ गया, पर उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ रही थी।

"क्या हुआ संजय ?"

"वो नोट्स कहां है सोनल?"

"वो रखे हुये हैं ..."

वो जल्दी से अन्दर आ गया और कॉपी देखने लगा। जैसे ही उसकी नजर मेज़ पर रखे पत्र पर पड़ी ... वो कांप सा गया। उसने झट से उसे उठा लिया और अपनी जेब में रख लिया।

"सोनू, इसे देखा तो नहीं ना ... "

"हां देखा है ... क्यू, क्या हुआ ... अच्छा लिखते हो !"

"सॉरी ... सॉरी ... सोनू, मेरा वो मतलब नहीं था, ये तो मैंने यूं ही लिख दिया था।"

"इसमे सॉरी की क्या बात है ... तुम्हारे दिल में जो था... बस लिख दिया...।"

उसे कुछ समझ में नहीं आया वो सर झुका कर चला गया। मैं उसके भोलेपन पर मुस्करा उठी। उसके दिल में मेरे लिये क्या भावना है मुझे पता चल गया था।

रात भर बस मुझे संजय का ही ख्याल आता रहा :

कि जैसे संजय ने मेरे स्तन दबा लिये और मेरे चूतड़ों में अपना लण्ड घुसा दिया। मैं तड़प उठी। वो मुझसे चिपका जा रहा था, मुझे चुदने की बेताबी होने लगी। मैंने घूम कर उसे पकड़ लिया और बिस्तर पर गिरा दिया। उसका लण्ड मेरी चूत में घुस गया। मेरा शरीर ठण्ड से कांप उठा। मैंने उसके शरीर को और जोर से दबा लिया।

मेरी नींद अचानक खुल गई। जाने कब मेरी आंख लग गई थी ... ठण्ड के मारे मैं रज़ाई खींच रही थी ... और एक मोहक सपना टूट गया। मैंने अपने कपड़े बदले और रज़ाई में घुस कर सो गई। सवेरे मेरे पति नाईट ड्यूटी करके आ चुके थे और वो चाय बना रहे थे। मैंने जल्दी से उठ कर बाकी काम पूरा किया और चाय लेकर बैठ गये।

कॉलेज में संजय मुझसे दूर दूर भाग रहा था, पर केन्टीन में मैंने उसे पकड़ ही लिया। उसकी झिझक मैंने दूर कर दी। मेरे दिल में उसके लिये प्रेम भाव उत्पन्न हो चुका था। वो मुझे अपना सा लगने लगा था। मेरे मन में उसके लिये भावनायें पैदा होने लगी थी।

"मैंने आप से माफ़ी तो मांग ली थी ना !" उसने मायूसी से सर झुकाये हुये कहा।

"सुनो संजय, तुम तो बहुत प्यारा लिखते हो, लो मैंने भी लिखा है, देखो अकेले में पढ़ना !"

उसे मैंने एक कॉपी दी, और उठ कर चली आई। काऊन्टर पर पैसे दिये और घूम कर संजय को देखा। वो कॉपी में से मेरा पत्र निकाल कर अपनी जेब में रख रहा था।

हम दोनों की दूर से ही नजरें मिली और मैं शरमा गई। उसमें मर्दानगी जाग गई ... और फिर एक मर्द की तरह वो उठा और काऊन्टर पर आ कर उसने मेरे पैसे वापस लौटाये औए स्वयं सारा पेमेन्ट किया। मैं सर झुकाये तेजी से क्लास में चली आई।

पूरा दिन मेरा दिल क्लास में नहीं लगा, बस एक मीठी सी गुदगुदी दिल में उठती रही। जाने वो पत्र पढ़ कर क्या सोचेगा।

रात को मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई, मैं अनमनी सी हो उठी। उसे मैंने रात को क्यों बुला लिया? यह तो गलत है ना ! क्या मैं संजय पर मरने लगी हूँ ? क्या यही प्यार है ? हाय ! वो पत्र पढ़ कर क्या सोचेगा, क्या मुझे चरित्रहीन कहेगा ? या मुझे भला बुरा कहेगा।

जैसे जैसे उसके आने का समय नजदीक आता जा रहा था, मेरी दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी। मुझे लगा कि मैं पड़ोसी के यहां भाग जाऊं, दरवाजा बन्द देख कर वह स्वतः ही चला जायेगा। बस ! मुझे यही समझ में आया और मैंने ताला लिया और चल दी। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला तो दिल धक से रह गया। संजय सामने खड़ा था। मेरा दिल जैसे बैठने सा लगा।

"अरे मुझे बुला कर कहां जा रही हो ?"

"क्... क... कहां भला... कही नहीं ... मैं तो ... मैं तो ..."

"ओ के, मैं फ़िर कभी आ जाऊंगा ... चलता हूँ !"

"अरे नहीं... आओ ना... वो बात यह है कि अभी घर में कोई नहीं है..."

"ओह्ह ... आपकी हालत कह रही है कि मुझे चला जाना चाहिये !"

मैंने उसे अन्दर लेकर जल्दी से दरवाजा बन्द कर दिया।

"देखो संजू, वो खत तो मैंने ऐसे ही लिख दिया था ... बुरा मत मानना..."

उसका सर झुक गया। मैंने भी शरम से घूम कर उसकी ओर अपनी पीठ कर ली।

"पर आपके और मेरे दिल की बात तो एक ही है ना ..." उसने झिझकते हुये कहा।

मुझे बहुत ही कोफ़्त हो रही थी कि मैंने ऐसा क्यूँ लिख दिया। अब एक पराया मर्द मेरे सामने खड़ा था। उसकी भी भला क्या गलती थी। तभी संजय के हाथों का मधुर सा स्पर्श मेरी बाहों पर हुआ।

"सोनू, आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो..." उसने प्रणय निवेदन कर डाला।

यह सुनते ही मेरे शरीर में बर्फ़ सी लहरा गई। मेरी आंखे बन्द सी हो गई।

"क्या कह रहे हो? ऐसा मत कहो ..." मेरे नाजुक होंठ थरथरा उठे।

"मैं ... मैं ... आपसे प्यार करने लगा हूँ सोनू ... आप मेरे दिल में समा गई हो !"

वो अपने प्यार का इजहार कर रहा था। उसकी हिम्मत की दाद देनी होगी।

"मैं शादीशुदा हू, सन्जू ... यह पाप है ... " मैं उसकी ओर पलट कर बोली।

उसने मुझे प्यार भरी नजरों से देखा और मेरी बाहों को पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया। मैं उसकी बलिष्ठ बाहों में कस गई।

"पत्र में आपने तो अपना दिल ही निकाल कर रख दिया था ... है ना ! यह दिल की आवाज है, आपको मेरे बाल, मेरा चेहरा, सभी कुछ तो अच्छा लगता है ना !"

"आह्ह्ह ... छोड़ो ना ... मेरी कलाई !"

"सोनू, दिल को खुला छोड़ दो, वो सब हो जाने दो, जिसका हमें इन्तज़ार है।"

उसने अपने से मुझे चिपका लिया था। पर मेरा दिल अब कुछ ओर कहने लगा था। ये सुहानी सी अनुभूति मुझे बेहोश सी किये जा रही थी। सच में एक पराये मर्द का स्पर्श में कितना मधुर आनन्द आता है ... यह अनैतिक कार्य मुझे अधिक रोमांचित कर रहा था ... । उसके अधर मेरे गुलाबी गोरे गालों को चूमने लगे थे। मैं अपने आप को छुड़ाने की नाकामयाब कोशिश बस यूँ ही कर रही थी। वास्तव में मेरा अंग अंग कुचले और मसले जाने को बेताब हो रहा था। अब उसके पतले पतले होंठ मेरे होंठों से चिपक गये थे।

उसके मुख से एक मधुर सी सुगंध मेरी सांसों में घुल गई। धीरे धीरे मैं अपने आप को उसको समर्पण करने लगी। उसके अधर मेरे नीचे के अधर को चूसने लगे।

फिर उसकी लपलपाती जीभ मेरे मुख में प्रवेश कर गई और मेरी जीभ से टकरा गई। मैंने धीरे से उसकी जीभ मुख में दबा ली और चूसने लगी। उसके हाथ मेरे जिस्म पर लिपट गये और मेरी पीठ, कमर और चूतड़ों को सहलाने लगे। मेरे शरीर में बिजलियाँ तड़कने लगी। उसका लण्ड भी कड़क उठा और मेरे कूल्हों से टकराने लगा। मेरा धड़कता सीना उसके हाथों में दब गया। मेरे मुख से सिसकारी फ़ूट पड़ी। मैंने उसे धीरे से अपने से अलग कर दिया।

"यह क्या करने लगे थे हम ... !" मैं अपनी उखड़ी सांसें समेटते हुई बोली।

"वही जो दिल की आवाज है ... " उसकी आवाज जैसे बहुत दूर से आ रही हो।

"मैं अपने पति का विश्वास तोड़ रही हूँ ! ... है ना ?"

"नहीं, विश्वास अपनी जगह है ... जिसे पाने से खुशी लगे उसमे कोई पाप नहीं है, खुशी पाना तो सबका अधिकार है ... दो पल की खुशी पाना विश्वास तोड़ना नहीं है।"

"तुम्हारी बातें मानने को मन कर रहा है ... तुम्हारे साथ मुझे बहुत आनन्द आ रहा है।" मैंने जैसे समर्पण भाव से कहा।

"तो शर्म काहे की ...? दो पल का सुख उठा लो ... किसी को पता भी नहीं चलेगा... ! आओ !"

मैं बहक उठी, उसने मुझे लिपटा लिया। मैंने भी हिम्मत करके उसकी पैन्ट की ज़िप में हाथ घुसा दिया। उसका लण्ड का आकार भांप कर मैं डर सी गई। वो मुझे बहुत मोटा लगा। उसे पकड़ने का लालच मैं नहीं छोड़ पाई। उसे मैंने अपनी मुट्ठी में दबा लिया। मैं उसे अब दबाने कुचलने लगी। लण्ड बहुत ही कड़ा हो गया था।

वो मेरी चूचियाँ सहलाने लगा ... एक एक कर के उसने मेरे ब्लाऊज के बटन खोल दिये। मेरी स्तन कठोर हो गये थे। निपल भी कड़े हो कर फ़ूल गये थे। ब्रा के हुक भी उसने खोल दिये थे। ब्रा के खुलते ही मेरे उभार जैसे फ़ड़फ़ड़ा कर बाहर निकल कर तन गये। जवानी का तकाजा था ... मस्त हो कर अंग अंग फ़ड़क उठा। मेरे कड़े निपल को संजू बार बार हल्के से घुमा कर दबा देता था। मेरे मन में एक मीठी सी टीस उठ जाती थी। भरी जवानी चुदने को तैयार थी। मेरी साड़ी उतर चुकी थी, पेटिकोट का नाड़ा खुल चुका था। मुझे भला कहाँ होश था ... उसने भी अपने कपड़े उतार दिये थे। उसका लण्ड देख देख कर ही मुझे मस्ती चढ़ रही थी।

उसके लण्ड की चमड़ी खोल कर मैंने ऊपर खींच दी। उसका लाल फ़ूला हुआ मस्त सुपाड़ा बाहर आ गया, मैंने पहली बार किसी का इस तरह सुपाड़ा देखा था। मेरे पति तो बस रात को अंधेरे में मुझे चोद कर सो जाया करते थे, इन सब चीज़ों का आनन्द मेरी किस्मत में नहीं था। आज मौका मिला था जिसे मैं जी भर कर मन भर लेना चाहती थी।

इस मोटे लण्ड का भोग का आनन्द पहले मैं अपनी गाण्ड से आरम्भ करना चाहती थी, सो मैंने उसका लण्ड मसलते हुये अपनी गाण्ड उसकी ओर कर दी।

"संजय, यह तेरा 19 साल का मुन्ना, मेरे 21 साल के गोलों को मस्त करेगा क्या ?"

"सोनू ... इतने सुन्दर, आकर्षक गोलों के बीच छिपी हुई मस्ती भला कौन नहीं उठाना चाहेगा, ये चिकने, गोरे और मस्त गाण्ड के गोले मारने में बहुत मजा आयेगा।"

मैं अपने हाथ पलंग पर रख कर झुक गई। उसके लाल सुपाड़े का स्पर्श होते ही मेरे जिस्म में कंपकंपी सी फ़ैल गई। बिजलियाँ सी लहरा गई। उसका सुपाड़े का गद्दा मेरे कोमल चूतड़ों के फ़िसलता हुआ छेद पर आ कर टिक गया। उसके लण्ड पर शायद चिकनाई उभर आई थी, हल्के से जोर लगाने पर ही अन्दर उतर गया था।

मुझे बहुत ही कसक भरा सुन्दर सा आनन्द आया। मैंने अपनी गाण्ड ढीली कर दी ... और अन्दर उतरने की आज्ञा दे दी। मेरे कूल्हों को थाम कर और थपथपा कर उसने मेरे चूतड़ो के पट को और भी खींच कर खोल दिया और लण्ड भीतर उतारने लगा।

"सोनू, आनन्द आया ना ... ?" संजू मेरी मस्ती को भांप कर कहा।

"ऐसा आनन्द तो मुझे पहली बार आया है ... तूने तो मेरी आंखें खोल दी हैं यार !"

मैंने अपने दिल की बात सीधे ही कह दी। वो बहुत खुश हो गया कि इन सभी कामों में मुझे आनन्द आ रहा है।

"ले अब और मस्त हो जा...!" उसका लण्ड मेरी गाण्ड में पूरा उतर चुका था। मोटा लण्ड था पर उतना भी नहीं मोटा, हां पर मेरे पति से तो मोटा ही था। मंथर गति से वो मेरी गाण्ड चोदने लगा। मेरे शरीर में इस चुदाई से एक मीठी सी लहर उठने लगी ... एक आनन्ददायक अनुभूति होने लगी। जवान गाण्ड चुदने का मजा आने लगा। दोनों चूतड़ों के पट खिले हुये, लण्ड उसमें घुसा हुआ, यह सोच ही मुझे पागल किये दे रही थी। वो रह रह कर मेरे कठोर स्तनों को दबाने का आनन्द ले रहा था ... उससे मेरी चूत की खुजली भी बढ़ती जा रही थी।

चुदाई तेज हो चली थी पर मेरी गाण्ड की मस्ती भी और बढ़ती जा रही थी। मुझे लगा कि कहीं संजय झड़ ना जाये, सो मैंने उसे चूत मारने को कहा,"संजू, हाय रे ! अब मुझे मुनिया भी तड़पाने लगी है ... देख कैसी चू रही है..."

" सोनू, गाण्ड मारने से जी नहीं भर रहा है ... पर तेरी मुनिया भी प्यारी लग रही है !"

उसने अपना हाथ मेरी चूत पर लगाया तो मेरा मटर का मोटा दाना उसके हाथ से टकरा गया,"ये तो बहुत मोटा सा है ... " और उसको हल्के से पकड़ कर हिला दिया।

"हाय्य्य , ना कर, मैं मर जाऊंगी ... कैसी मीठी सी जलन होती है..."

उसका लण्ड मेरी गाण्ड से निकल चुका था। उसका हाथ चूत की चिकनाई से गीला हो गया था। उसने नीचे झुक कर मेरी चूत को देखा और अंगुलियों से उसकी पलकें अलग-अलग कर दी और खींच कर उसे खोल दिया।

"एक दम गुलाबी ... रस भरी ... मेरे मुन्ने से मिलने दे अब इसे !"

उसने मेरे गुलाबी खुली हुई चूत में अपना लाल सुपाड़ा रख दिया। हाय कैसा गद्देदार नर्म सा अह्सास ... फिर चूत की गोद में उसे समर्पित कर दिया।

उसका लण्ड बड़े प्यार से दीवारों पर कसता हुआ अन्दर उतरता गया, और मैं सिसकारी भरती रही। चूंकि मैं घोड़ी बनी हुई थी अतः उसका लण्ड पूरा जड़ तक पहुंच गया। बीच बीच में उसका हाथ मेरे दाने को भी छेड़ देता था और मेरी चूत में मजा दुगना हो जाता था। वो मेरा दाना भी जोर जोर से हिलाता जा रहा था। लण्ड के जड़ में गड़ते ही मुझे तेज मजा आ गया और दो तीन झटकों में ही जाने क्या हुआ, मैं झड़ने लगी। मैं चुप ही रही, क्योंकि वो जल्दी झड़ने वाला नहीं लगा।

उसने धक्के तेज कर दिये ... शनैः शनैः मैं फिर से वासना के नशे में खोने लगी।

मैंने मस्ती से अपनी टांगें फ़ैला ली और उसका लण्ड फ़्री स्टाईल में इन्जन के पिस्टन की तरह चलने लगा। मुझे बहुत खुशी हो रही थी कि थोड़ी सी हिम्मत करने से मुझे इतना सारा सुख नसीब हो रहा है। मेरे दिल की तमन्ना पूरी हो रही है। मेरी आंखें खुल चुकी थी... चुदने का आसान सा रास्ता था ... थोड़ी हिम्मत करो और मस्ती से नया लण्ड खाओ। मुझे बस यही विचार आनन्दित कर रहा था ... कि भविष्य में नये नये लण्ड का स्वाद चखो और जवानी को भली भांति भोग लो।

"अरे धीरे ना ... क्या फ़ाड़ ही दोगे मुनिया को...?

वो झड़ने के कग़ार पर था, मैं एक बार फिर झड़ चुकी थी। अब मुझे चूत में लगने लगी थी। तभी मुझे आराम मिल गया ... उसका वीर्य निकल गया। उसने लण्ड बाहर निकाल लिया और सारा वीर्य जमीन पर गिराने लगा। वो अपना लण्ड मसल मसल कर पूरा वीर्य निकालने में लगा था। मैं उसे अब खड़े हो कर निहार रही थी।

"देखा, संजू तुमने मुझे बहका ही दिया और मेरा फ़ायदा उठा लिया !"

"काश तुम रोज ही बहका करो तो मजा आ जाये..." वो झड़ने के बाद जाने की तैयारी करने लगा। रात के ग्यारह बजने को थे। वो बाहर निकला और यहाँ-वहाँ देखा, फिर चुपके से निकल कर सूनी सड़क पर आगे निकल गया।

संजय के साथ मेरे काफ़ी दिनों तक सम्बन्ध रहे थे। उसके पापा की बदली होने से वो एक दिन मुझसे अलग हो गया। मुझे बहुत दुःख हुआ। बहुत दिनों तक उसकी याद आती रही।

मैंने अब राहुल से दोस्ती कर ली थी। वह एक सुन्दर, बलिष्ठ शरीर का मालिक था। उसे जिम जाने का शौक था। पढ़ने में वो कोई खास नहीं था, पर ऐसा लगता था कि वो मुझे भरपूर मजा देगा। उसकी वासनायुक्त नजरें मुझसे छुपी नहीं रही। मैं उसे अब अपने जाल में लपेटने लगी थी। वो उसे अपनी सफ़लता समझ रहा था। आज मेरे पास राहुल के नोट्स आ चुके थे ... मैं इन्तज़ार कर रही थी कि कब उसका भी कोई प्रेम पत्र नोट्स के साथ आ जाये ... जी हां ... जल्द ही एक दिन पत्र आ गया ...

प्रिय पाठको ! मैं नहीं जानती हूं कि आपने अपने विद्यार्थी-जीवन में कितने मज़े लूटे। पर हां अभी भी आप यह सुन्दर सुख भोगने की लालसा रखती हैं तो जरूर ये सुख भोगे। ध्यान रहे सुख भोगने से विश्वास का कोई सम्बन्ध नहीं है। सुख पर सबका अधिकार है, पर हां, इस चक्कर में अपने पति को मत भूल जाना, वो तो जिन्दगी भर के लिये है।

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